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Hindi Poem: ‘सूर्य पुत्र कर्ण’: By Ekagra Singh, Apeejay Svran Global School, Faridabad 21 D
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11 months agoon

जिसे बचपन में पैदा होते ही गंगा जी में त्याग दिया,
सारथी के घर में पल बढ़ कर सारथी होना न स्वीकार किया।
जन्म से व्यक्ति का परिचय हो इस सोच को ठुकराने वाला था,
कर्म सर्वश्रेष्ठ है यह कर्म ही पहचान यह नई मत देने वाला था।
जब द्रोणाचार्य ने कह सारथी पुत्र शिक्षा से इनकार किया,
हिम्मत न हारी उसने परशुराम जी का आहवान किया ।
स्वयं परशुराम जी का शिष्य वह युद्ध नीति का ज्ञानी था,
देवराज इंद्र जिससे भिक्षा मांगे ऐसा वह महादानी था।
अपमान पर अपमान सहन करे योद्धा ने ,
सूतपुत्र कहा जब स्वयं अनुजों ने भरी सभा में अपमान किया।
माता उसकी मौन रही तब दुर्योधन ने लाज रखी,
उसने मित्रता का हाथ दिया।
भाग्य का कैसा खेल था या सृष्टि रचयिता की शरारत,
कुरुक्षेत्र की रणभूमि सजी जहां सब मर्यादाओं का संहार हुआ।
भाई ने भाई का रक्त पिया ऐसा दृश्य भयानक था।
मृत्यु बिलख कर रो उठी काल देख रहा मौन था।
पांडव वास्तव में है अनुज,
जब श्रीकृष्ण ने ज्ञान दिया।
जरुरत में मित्र का साथ ना छोड़ा,
वह ऋणी मजबूर था।
देखा जब सामने अनुज को,
तब कदम कैसे न लड़खड़ाते।
जिन हाथों ने था उसे थामना ,
वे धनुष कैसे उठा पाते।
घमासान का युद्ध हुआ ,
दिल छलनी हो गया था योद्धा का।
जब विनती करने मां आई ,
उसने पांडवों को जीवनदान दिया।
अग्नि का वह रथ था,
ध्वज पर श्री हनुमान।
गांडीव लिए अर्जुन जैसा महारथी,
और रथ पर थे श्रीकृष्ण विराजमान।
ऐसा दृश्य देख कर भय जिसके निकट न आए ,
वह अजय कर्ण था।
श्रीकृष्ण जिसकी प्रशंसा कर रुक न पाए,
वह महावीर कर्ण था।
अंत में रथ धोखा दे गया,
विद्या जब साथ छोड़ गई।
तब रणभूमि में निहत्था ही गिरा ,
वह क्षत्रियों में श्रेष्ठ था।
यह सूर्य पुत्र कर्ण था।
यह दानवीर कर्ण था