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‘आत्मनिर्भर स्त्री’:  कविता-अदिति शुक्ला, एआईएमसी   

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रात की चाँदनी नहीं, दिन की रोशनी बनना है मुझे।

किसी की प्रेयसी नहीं, देश की विदुषी बनना है मुझे।

ख्यालों की मलिका नहीं, हक़ीक़त की योद्धा बनना है मुझे।

सिर्फ घर की लक्ष्मी नहीं, ज्ञान की सरस्वती बनना है मुझे।

ऐ समाज बस इतना ही कहना है मुझे तुमसे 

कि सिर्फ किसी की पत्नी नहीं, एक आत्मनिर्भर स्त्री बनना है मुझे।