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‘दिल्ली’: Poem by Anjali Singh, AIMC

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दिल्ली की गलियाँ हो या इमारतें,
सड़कें हो या दुकानें
दिल्ली शब्द ही एक एहसास है,
एहसास जो धूप से निकल कर
पत्तो से झलक कर हवाओं से उलझ कर
पहुँचती है हर वो एक ज़ेहन तक जहाँ बसी है एक प्यारी गूँज बस दिल्ली के नाम की।
यहाँ कलम क्या कोरा कागज़ क्या,
बातें तो दीवारें भी करती हैं, कोई यादों को संभाल कर रखती है, कोई दिशाओं को, कोई बातों को संभाल
कर रखती है कोई राहों को!
यह दिल्ली है जनाब, यहां सपने भी हकीकत से खूबसूरत होते है।

 Anjali Singh, AIMC
TVRJ