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‘गणपति की भावनाएं’: Special poem by Anushka, Apeejay School, Nerul
Published
2 years agoon
Class: 10-C

गणपति की भावनाएं
हिमालय से उतरे देखो गजानन,
भक्तों के घर करने आगमन।
हर्षित है मिलने को भक्तों से भगवान,
बनने को भक्तों के कष्टभंजन।
मात-पिता का आशीष लियो है,
रिद्धि-सिद्धि को संग लियो है।
संतानों से प्रेम से विदा लियो है,
कैलाश से बप्पा चल दियो है।
भक्तों के घर आएंगे बप्पा,
भक्तों संग धूम मचाएंगे बप्पा।
भक्तों के दुख मिटाएंगे बप्पा,
आंखों में सबकी बस जाएंगे बप्पा।
भक्त विनायक पर प्रेम लुटाएंगे,
गणपति उसको समेटते जाएंगे।
भक्तों के भोग का आनंद उठाएंगे,
सारे भक्तों के मन में समाएंगे।
भक्तों के बीच पधारे हैं बप्पा,
भक्तों के जीवन संवारें हैं बप्पा।
भक्तों पर प्रेम लुटाएंगे बप्पा,
दिल में उनको बसाएंगे बप्पा।
तन-मन-धन वारें हम उन पर,
आशीर्वाद लुटाएं वह हम पर।
धूम मचाएंगे गणेशोत्सव पर,
कृपा लुटाए देखो बप्पा आज खुलकर।
देख के मन आज व्याकुल हुआ है,
गणपति का मन भारी हुआ है।
भक्तों का मन भी व्याकुल हुआ है,
गणेशोत्सव यह पूरा हुआ है।
दस दिवस यह कैसे बीत गया,
विसर्जन का समय आ गया।
बप्पा भी सोचें यह कैसे हो गया,
जाने का मेरे समय आ गया।
आंखें हैं नम देखो बप्पा की,
व्यथा है यह उनके मन की।
कैसी लीला है यह नियति की,
भगवान को भी विवश है करती।
दुख को अपने छिपाते हैं बप्पा,
भक्तों के लिए मुस्कुराते हैं बप्पा।
भक्तों को दिल में बसाते हैं बप्पा,
दुख को अपने भूल जाते हैं बप्पा।
विसर्जन बप्पा का पूरा हुआ है,
भक्तों ने बप्पा को विदा किया है।
भारी मन से बप्पा चले हैं,
भक्तों को अपने याद करे हैं।
मुड़ मुड़ के पीछे देखे हैं बप्पा,
भक्तों को अपने निहारे हैं बप्पा।
दूर न भक्तों से जा पाएं बप्पा,
पर समय को न बदल पाएं बप्पा।
बप्पा वापस कैलाश आए हैं,
पीड़ा अपनी छिपा न पाए हैं।
मन को अपने बहला न पाए हैं,
इन प्यारे दिनों को भुला न पाए हैं।