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Social Media Detox: खुद से मिलने का वक़्त
Published
1 week agoon
कनिष्का शर्मा

कभी खुद से पूछा है, आख़िरी बार तुमने अपने आप से बात कब की थी?
नहीं, किसी चैट पर नहीं, किसी पोस्ट पर नहीं — बस सच में, खुद से।
शायद याद भी न हो।
क्योंकि अब हमारी ज़िंदगी फोन की स्क्रीन में सिमट गई है।
सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले मोबाइल उठाते हैं,
नोटिफ़िकेशन देखते हैं, फिर स्क्रॉल करना शुरू कर देते हैं।

दिन की शुरुआत किसी और की तस्वीरों से होती है,
और रात खत्म होती है “लास्ट सीन” देखकर।
सोशल मीडिया अब सिर्फ़ एक ऐप नहीं रहा,
ये हमारी रोज़मर्रा की आदत बन चुका है।
हम अब वो नहीं दिखाते जो हैं,
हम वो बनने की कोशिश करते हैं जो लोग देखना चाहते हैं।
खुशियाँ अब “लाइक” और “कमेंट” से नापी जाती हैं।
कभी किसी की मुस्कुराती फोटो देखकर अपने अंदर खालीपन महसूस होता है,
तो कभी किसी की छुट्टियों की तस्वीर देखकर सोचते हैं —
“काश, मैं भी वहाँ होता।”
धीरे-धीरे हम अपनी असली खुशी भूलने लगते हैं।
और फिर एक दिन, ऐसा लगता है कि बहुत शोर है…
हर वक्त फोन, नोटिफ़िकेशन, मैसेज, रील्स…
और अंदर से कोई आवाज़ कहती है —
“बस, अब थोड़ी देर रुक जाओ।”
यहीं से शुरू होता है सोशल मीडिया डिटॉक्स —
मतलब थोड़ा वक्त अपने लिए, बिना स्क्रीन के।
डिटॉक्स का मतलब ये नहीं कि सोशल मीडिया छोड़ दो,
बस थोड़ा कम इस्तेमाल करो।
थोड़ा वक्त खुद को दो।
सोचो, अगर एक दिन के लिए फोन बंद कर दो तो क्या होगा?
पहले तो बेचैनी होगी, लगेगा कुछ छूट रहा है।
पर कुछ देर बाद शांति मिलने लगेगी।
हवा की खुशबू महसूस होगी, आसमान अच्छा लगेगा,
और लगेगा कि दुनिया बिना फोन के भी चल रही है।
दिल्ली की आर्या नाम की लड़की ने एक हफ्ते के लिए इंस्टाग्राम डिलीट किया।
वो बताती है,
“पहले दो दिन बहुत अजीब लगे।
बार-बार फोन देखने का मन होता था।
लेकिन तीसरे दिन जब मैं बिना मोबाइल के टहलने गई,
तो लगा जैसे मैं फिर से खुद को जान रही हूँ।
मैंने देखा कि बच्चे खेल रहे हैं, लोग बातें कर रहे हैं —
और ये सब बिना कैमरे के हो रहा था।”
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सोशल मीडिया हमारे दिमाग में
डोपामिन नाम का केमिकल रिलीज़ करता है,
जो हमें थोड़ी देर के लिए खुश करता है।
लेकिन जब वो नहीं मिलता, तो हम बेचैन हो जाते हैं।
डिटॉक्स उस बेचैनी से बाहर आने का तरीका है।
थोड़ा वक्त ऐसा रखो जब फोन साइलेंट पर हो।
सुबह उठते ही स्क्रीन मत देखो,
थोड़ा बाहर देखो, सूरज की रोशनी महसूस करो।
हर बात पोस्ट करने की ज़रूरत नहीं होती,
कुछ बातें सिर्फ़ तुम्हारे और तुम्हारे मन के बीच रहनी चाहिए।
कभी बिना ईयरफोन के टहलना,
कभी बस चुपचाप बैठना —
यही वो पल हैं जब तुम खुद से मिलते हो।
सोशल मीडिया ने हमें जोड़ा तो है,
लेकिन कहीं न कहीं दूर भी कर दिया है।
हम “टाइपिंग…” देखते हैं,
पर आँखों में देखकर बात नहीं करते।
हम “फॉलो” करते हैं,
लेकिन समझते नहीं।
डिटॉक्स सिखाता है कि जुड़ाव ज़रूरी है,
लेकिन सबसे पहले खुद से।
एक शाम मीरा ने फोन बंद किया और बस आसमान देखा।
हवा चल रही थी, बादल थे,
और उसने सोचा —
“कितनी देर हो गई, मैंने ये सब महसूस ही नहीं किया।”
वो मुस्कुराई और खुद से कहा,
“अब मुझे किसी लाइक की ज़रूरत नहीं,
मुझे बस अपनी हाँ चाहिए।”
कभी-कभी दुनिया से नहीं,
बस नोटिफ़िकेशन से ब्रेक लेना ज़रूरी होता है।
जब तुम खुद से मिलने बैठते हो,
तो समझते हो कि ज़िंदगी अब भी खूबसूरत है —
बस उसे देखने के लिए
स्क्रीन से नज़रें उठानी पड़ती हैं।