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‘मैं भी दिल्ली आया हूँ’: Poem by Vivek Joshi, AIMC
Published
2 years agoon

पढ़ना था तो गांव से दूरी की।
पहाड़ छूटे तो इन शहरों से दोस्ती की
कभी सारा दिन भूखे तो कभी बस नाश्ता है किया
प्यास लगी और पानी भी यहां खरीद कर पिया
पर इन सब के बीच एक खूबसूरत शहर मुझे मिला
नए नए लोग और एक नया सवेरा मुझे मिला।
बेहद ही हसीन इस शहर का सफर रहा
किराए की जिंदगी और किराए का घर रहा
एक रोज़ बैठा, और सोच में यही सोचता रहा
घर की याद आई और मैं फिर रोता रहा
वो हर रोज था मां के हाथ का खाना, और था बाप हर मुश्किल में साथ।
अब हर रोज जलती हैं मेरी रोटियां, और मुस्किल से होती हैं घर पर बात।
पहाड़ों से निकल एक मुसाफिर बन मैं यहां आया हूं
कुछ कर दिखाने का जज्बा लिए मैं भी दिल्ली आया हूं।
लहजे में नरमी होठों पे मुस्कान लिए आया हूं
मां बाप के वो सपने पूरे करने मैं भी दिल्ली आया हूं
आंखों में नमी और पलकों पर अरमां लिए आया हूं
आखिरकार अपना गांव छोड़ मैं भी दिल्ली आया हूं…
मैं भी दिल्ली आया हूं…
Vivek Joshi, AIMC