Course: BJMC Second year

है जननी तू, जीवन भी तू
तो मृत्यु और संहार भी बन।।
इस दुनिया में न राम कोई
सीता बनने की चाह न कर।।
हैं रक्तबीज महिषासुर बैठे
तू दुर्गा बनने में लाज न कर।।
न त्रेता में कोई आया काम, कलयुग में क्या ही आएगा
शस्त्र उठालो हे नारी, ईश्वर भी न आ पाएगा ।।
जो दुष्ट कोई तुम तक आए, काली का लेना रूप धार
शस्त्र उठाकर हाथों में, लेना पापी का शीश उतार।।
तू क्यों रोए, क्यों घबराए आदिशक्ति तुझ में विराजती हैं
उठा तलवार और चल रण को , देख धरा यह कैसे कांपती हैं।।
अब अत्याचार हद को पार किया, खुद में तू प्रलय का नाद जगा।
अपने रौद्र रूप के आगे काल के भी तू कदम डिगा।।
तेरे चरणों में देव झुके, तू शक्ति का अवतार बन आ
तेरी गर्जना से कांपे पापी रण में ऐसी चीत्कार जगा
जब धरा पर तूने क्रोध दिखाया, सृष्टि सारी कांपी थी
खुद शिव शंकर को भी आना पड़ा,जब नारी रौद्र रूप को धारी थी।।
Poem by Keshvi Priya Sinha
Course: BJMC Second year
ASU
